पंजाब में आउटसोर्स पर काम कर रहे चौकीदारों से जुड़ा एक मामला सामने आया है जिसमें हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। ये कर्मचारी कई सालों से अलग-अलग सरकारी विभागों में ड्यूटी कर रहे थे लेकिन उनकी नौकरी पक्की नहीं थी और वेतन को लेकर भी लगातार शिकायतें चल रही थीं। मामला कोर्ट में पहुंचा तो पूरी स्थिति को देखा गया और अब आदेश जारी कर दिया गया है। इस फैसले के बाद आउटसोर्स कर्मचारियों से जुड़े नियम और उनकी सेवा स्थिति को लेकर कुछ हद तक स्पष्टता आई है, क्योंकि लंबे समय से ऐसे कर्मचारियों की नौकरी, वेतन और भत्तों को लेकर अलग-अलग जगह सवाल उठते रहे हैं और कई विभागों में इसी तरह की व्यवस्था चल रही है।
लंबे समय से चल रहा था कर्मचारियों का मामला
जानकारी के अनुसार याचिका लगाने वाले कर्मचारी साल 2008 से अलग-अलग विभागों में आउटसोर्स एजेंसी के जरिए चौकीदार के रूप में काम कर रहे थे। उनका कहना था कि वे लगातार और नियमित रूप से काम कर रहे हैं और उनका काम स्थायी प्रकृति का है, इसलिए उन्हें समान काम के बदले समान वेतन मिलना चाहिए। इसके साथ उन्होंने न्यूनतम वेतन और महंगाई भत्ता देने की भी मांग रखी थी। कर्मचारियों ने अपनी सेवाएं नियमित करने की बात भी कही थी, लेकिन 15 अक्तूबर 2020 को उनकी यह मांग अस्वीकार कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की और मामला सुनवाई में चला गया, जहां उनकी सेवा अवधि और काम की प्रकृति पर विस्तार से विचार हुआ।
वेतन भुगतान में अंतर की बात सामने आई
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि विभाग ठेकेदार को प्रति कर्मचारी करीब 14 हजार रुपये का भुगतान करता था, जबकि कर्मचारियों को सिर्फ 8500 रुपये ही मिलते थे। इससे यह स्पष्ट हुआ कि कर्मचारियों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन तक नहीं मिल रहा था। कोर्ट ने रिकॉर्ड और दस्तावेज देखने के बाद माना कि कर्मचारी कई सालों से लगातार सेवा दे रहे हैं और उनका काम विभाग के लिए जरूरी है। वे न तो पार्ट टाइम कर्मचारी थे और न ही कभी-कभार बुलाए जाने वाले कर्मचारी, इसके बावजूद उन्हें महंगाई भत्ता और न्यूनतम वेतन से वंचित रखा गया था, जिस पर कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की और पूरी स्थिति को अनुचित माना।
सरकार की जिम्मेदारी पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह कर्मचारियों से लंबे समय तक अस्थायी रूप में काम नहीं करवा सकती। जब काम स्थायी प्रकृति का हो और कर्मचारी वर्षों से सेवा दे रहे हों तो उन्हें आउटसोर्स पर रखना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक अस्थायी आधार पर काम करवाना गलत श्रम व्यवहार माना जाएगा और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 से जुड़ा मामला है। साथ ही कहा गया कि राज्य को एक जिम्मेदार नियोक्ता की तरह काम करना चाहिए और बजट संतुलन कर्मचारियों के हितों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए, क्योंकि वर्षों तक सेवा लेने के बाद नियमित करने से इनकार करना सही नहीं माना जा सकता।
छह हफ्तों में नियमित करने का आदेश
कोर्ट ने पंजाब सरकार को निर्देश दिया है कि छह हफ्तों के भीतर इन चौकीदारों की सेवाएं नियमित की जाएं। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि तय समय सीमा में आदेश लागू नहीं हुआ तो कर्मचारियों को स्वतः नियमित माना जाएगा। यह फैसला जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने पांच याचिकाओं का निस्तारण करते हुए सुनाया है। इस आदेश के बाद संबंधित कर्मचारियों की नौकरी को लेकर स्थिति पहले से ज्यादा स्पष्ट हो गई है और लंबे समय से लंबित उनकी मांग पर अब आधिकारिक रूप से निर्णय सामने आ गया है।
अन्य राज्यों के कर्मचारियों पर संभावित प्रभाव
इस फैसले के बाद अन्य राज्यों में आउटसोर्स पर काम कर रहे कर्मचारियों के बीच भी चर्चा बढ़ी है। कई राज्यों में ऐसे कर्मचारी लंबे समय से एक ही प्रकार का काम कर रहे हैं लेकिन उनकी सेवाएं नियमित नहीं हुई हैं और वेतन व भत्तों को लेकर भी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में इस फैसले को एक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जिससे समान स्थिति वाले कर्मचारियों के मामलों में कानूनी पहलू स्पष्ट हो सकते हैं। हालांकि हर राज्य के अपने नियम और प्रक्रिया होती है, फिर भी इस आदेश के बाद आउटसोर्स कर्मचारियों की सेवा और वेतन से जुड़ा मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है और प्रशासनिक स्तर पर भी इस पर ध्यान दिया जा रहा है।







